Sunday, January 10, 2016

आत्ममंथन: इंदिरा नेहरु से इंदिरा गाँधी तक!

आत्ममंथन: इंदिरा नेहरु से इंदिरा गाँधी तक!

Saturday, June 16, 2012

आख़िरी pasta !

ठीक पिछले साल की तर्ज़ पर  उस साल भी मेरे परम मित्र महादेव ने बॉलीवुड पार्टी के आयोजन करने का निर्णय लिया। और ठीक पिछले साल की ही तरह मुझे भी आमंत्रित किया। पिछले बार के कुछ बुरे अनुभवों के चलते इस बार dj अपदस्थ कर एक नए dj को नियुक्त किया गया था। इस बार का theme 70 के दशक का पहनावा एवं संगीत था।

मैं शुक्रवार को ही महादेव के निवासस्थान पर पहुंच गया था ताकि पार्टी के दिन फ्रेश फ्रेश रहूँ। रात को ही श्रीमान दुबे भी सपरिवार धमक गए थे। रात्री को भक्षण के पश्चात जा सब बैठे तो श्रीमती दुबे ने निवेदन किया की उन्हें horror फिल्म देखनी है, मैंने कहा youtube  पर "वो कौन थी" का बड़ा ज़बरदस्त प्रिंट है उसको देखते हैं। मैंने फिल्म सेट करके लगाई तो दर्शकगन  विद्रोह करने लगे यह कह कर की पिक्चर श्वेत एवं श्याम  हैं, मैंने कहाँ आगे जाकर रंगीन हो जाएगी लेकिन किसी ने मेरी बात नहीं सुनी और ऐसे ही पिक्चर बदलते बदलते समय
 निकलता गया और श्रीमती दुबे का होर्रोर फिल्म देखने का सपना अधूरा ही रह गया।

अगले दिन हम आराम से निंद्रा के आगोश से निकल 10 बजे उठे। हमने मंजन वंजन किया, नाश्ता ठूंसा और उसके पश्चात अपने साजो सामान को लेने मार्केट चले गए। वापास आये तो पुनः भक्षण किया आयर उसके पश्चात पार्टी की त्यारियों मैं लग गए। महादेव डिस्को डांसर बने हुए थे और बाकी सब लोग हिप्पी बने हुए थे।
पार्टी मैं पहुंचे तो इस बार पिछली बार की अपेक्षा संगीत काफी उम्दा था और डांस फ़लूर पर काफी लोग थ्रिअकते हुए नज़र आये। हमने भी पहुँचते ही फोटो session चालू कर दिया और धांय धांय दस बारह फोटुएं खींच डाली।

पार्टी का रंग धीरे धीरे बदने लगा। इस बार का dj काबिले तारीफ़ था, सारे गाने चुनिन्दा थे और पार्टी में आये हुए लोगों को डांस फ़लूर की तरफ आकर्षित कर रहे थे। रम रम व्हिसकी गाने पर तो मैं भी बहुत जोर से नाचा, सारे ही आमंत्रित जन भड़कते हुए संगीत  की धुन पर मनमोहित हुए जा रहे थे। धीरे धीरे खाने का समय करीब आ रहा था, मैं तो हमेशा ही खाने के लिए तत्पर रहता हूँ चूँकि मैं मेजबानों में से एक था इसीलिए मुझे आगाह किया गया की मैं अंत में ही buffet की तरफ जा पाउँगा।महादेव कह रह था की प्रति ग्राहाक सिर्फ सात item ही दिए जायेंगे  लेकिन खाद्य एवं पाद्य  के अनुभव होने के चलते मुझे ज्ञात था की buffet पर आप खाने को सीमित नहीं कर सक। जिसका दर था वही हुआ, buffet का खाना खत्म होने लगा बिल्कुल  उसी तरह जैसे पिरान्हस अपने शिकार को  चट कर जाती हैं। दुबे जी समाचार लेकर आये की पब्लिक बहुत खाना  व्यर्थ कर रही है इसलिए कुछ नियंत्रण लगाना होगा।

मैंने buffet की तरफ नज़र डाली तो पता चला महादेव एवं उनकी श्रीमती buffet के पीछे से खाना परोस रहे है ताकि दिया जाने वाला खाना नियंत्रित  करा जा सके. अब तक मेरे अमाशय में चूहे उछल कूद करने लगे थे, मैं buffet पर पहुंचा तो मुझे कुछ तली हुई टिक्की जैसी दिखाई दी, मैंने दुबे से पुछा की यह क्या है तो बोला  "शामी कबाब है शामी कबाब", हमने कहा गुरु यह बात। गिन कर सात item इस भूखे  कीप्लेट  में ड़ाल  दिए  गए। मैंने थोड़ी टोमाटो ketchup उड़ेली और "शामी कबाब" का जायाका उठाने के लिए तयार हो गया। खा कर देखा तो कुछ समझ में नहीं आया की यह क्या है, हाँ इतना जरूर समझ आ गया था की शामी कबाब नहीं है।

जब शामी कबाब का ऑपरेशन किया तो मालूम पड़ा की chef साहब ने पास्ता (मकारोनी) की fried टिक्कियाँ बनाई हैं। मुझे भी चेफ का काम करते हुए 15 साल हुए है लेकिन ऐसी क्रेअतिविटी मैंने पहले कभी नहीं देखी.


आखिर में यह शामी कबाब खाकर मेरे मुंह से दो शब्द निकले "आखिरी पास्ता ", I am Joking .

It was a successful party and we all enjoyed a  lot and now Mr Mahadev has decided to organise a "bollyowood lite" so there will be no food and only drink and dance which might result me in having no food for thought for my next blog.

Sunday, October 16, 2011

Bharat Darshan with Ginny and Rohini 2011

After 4 years long wait finally the trp got underway. I was all excited as the itineary was covering Haridwar and Udhampur. I was getting a chance to show Ginny the places where I have come from.



India has changed a lot in past few years and it is quite evident at the IG intl airport. I wish if same kind of development can spread across the hole country. Dilli has changed, the roads look wider and lots of flyovers have been made recently. However footpaths and encroached lands are still an area of concern. Traffic is major part of any infrastructure, we (India) will struggle to compete with developed economies till we make our traffic smoother. The main perils of India's lack of development is usually put on the population but Japan and Korea are similarly overpopulalted but they have less corruption and better work/social ethics.



My brother says that I am a hasty traveller and he says it for a reason. I reached India on 16th and we left for Haridwar in the wee hours of 17th with Janshatabdi express. I love travelling by train as it is totally a different experience compared to air travel and comfortable than by bus. It was hot outside but for locals it was pleasant as summers are really hot in India these days.

In the AC compartment quite a few passengers were playing with the smartphones and tablets. Recently the gulf between the poor and the richer is getting wider and I think that it is going to increase criminal behaviour. The distribution os wealth is not even, poor is struggling to earn even small sum of money whereas people who have money are just busy in locking it in safes or keeping it away from Govt's tax bracket.


We reached Haridwar in the afternoon. It was firing hot outside the AC compartment of our train. We managed to took a taxi to our hotel- Ginger Hotel. This is another welcoming development, a budget hotel with basic amenities and cleaner surroundings. The room was very clean and all the necessities were there. Lodging in India is very different from west, the days are not far when bed and breakfasts, apartment hotels will start sprucing up at tourist places.

In Haridwar we first went to see Mansa Devi. Luckily for us it was not crowded that day. The day was pretty clear and it was slightly warm, considering that summers are socrching hot these days it will not be exaggeration to say that weather was pleasant. Udan Khatola ride was plesant other than the fact that Ginny has acrophobia (fear of heights). The view from the summit is breathtaking and river Ganga looks like spreading its wings and disappearing into the oblivion.




As I have mentioned in my earlier posts as well that Ganga nadee has special place in my heart. I feel kind of attchement with it as I have spent my early days in swimming and sitting on the banks for hours and hours. Haridwar moves at sedentary pace and it can take you back in 200- 300 years back in time or more. We went to see our Nani's house where I spent lot of time with my elder brother and Nani jee. Like they say ' never forget where you have come from'. जननी एवं जन्मभूमि सवर्ग से भी बढकर हैं

It was anostalgic feeling to visit all those places. If there is a time machine then this is the only time machine where you can go back and reminsces of the days when you used to that and that. Every single thing narrates a story. We went on the roof of the house and I was telling Ginny as how we used to sunbathe during winters and tel maalish, varjish and interacting with neighbours and crossing the roofs of the neighbours.






Then we went to Rajghat where I used to spend morning and evening in swimming and only swimming. Bathing is Ganga gives you kind of high, I don't know why it happens. It could be because of the minerals in it or the coldness of the water. Not much has changed other than now there are ghats on either side of the Ganga. I took a dip as that quintessesntial, it is impossible to stop Rohini from getting into water as she is very fond of chappa chappa (playing in water). We had a short but nice time in our own Haridwar ki Ganga jee.




Monday, July 11, 2011

DJ से हमदर्दी





इस हफ्ते के आखिर में Reading जाना हुआ जहाँ बॉलीवुड पार्टी का आयोजन मेरे प्रिय मित्र महादेव ने किया हुआ था. पार्टी में खाने पीने की व्यवस्था के साथ साथ भोजन एवं मदिरा का भी प्रबंध था. मुख्य आकर्षण था DJ फ्रॉम southall हालांकि महादेव ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था की पार्टी में सिर्फ और सिर्फ हिंदी गाने बजेंगे लेकिन फिर भी दिल में एक संशय था कि क्या ऐसा संभव हो पायेगा?


Southall पंजाबी बहुल इलाका है और वह के लोग ज्यादातर Ms पूजा एवं Jazzy A , B ,C , D , इत्यादि को अधिक पसंद करते है (मने कि घटिया संगीत). फिर भी .. उम्मीद पर दुनिया कायम है और शायद इसी वजह से हमें भरोसा था कि संगीत अच्छा होगा.

कार्यकर्म कि सह आयोजिका आशा ने DJको एक लिस्ट भी दी थी जिनमे कौन कौन से गाने बजने है उनका विवरण था.

भोजन का प्रबंध बिलकुल Band Baaja Baraat मूवी कि तर्ज़ पर एक first time caterer  को दिया हुआ था. मुझे मेरे chef background को मद्देनज़र देखते हुए आंटी के घर से खाना pick up करने का काम सौंपा गया. मैंने खाने कि मात्रा देखते ही यह एलान कर दिया कि खाना कम पड़ेगा. आंटी जी भी डर सी गयी कि क्या वाकई खाना कम पद जायेगा? . जब महादेव को पता चला तो वो भी थोडा टेंशन में आ गया और मुझ पर बरसने भी लगा. मुझे लगा कि गलती होगई और सीटी बज गयी. ( हो सकता है मैं नाहक ही चिंतित हो रह हूँ)


पार्टी खूब धमाकेदार थी, मैंने, उत्तम, बिष्ट, दुबे ने जम कर डांस किया. एक लड़का जो भौचक्का सा दिख रह था,(जो उस पूरी रात भोचक तिवारी के नाम से जाना गया) वो भी खूब उछल कूद कर रह था. शुरू शुरू में जब तक DJ    के पास आशा के दिए हुए गाने थे जिसके चलते सारे लोग डांस फ़लूर पर थिरकते रहे परन्तु जैसे ही वह लिस्ट ख़तम हुई DJ का torture शुरू हुआ. DJ ने एक से एक बकवास गाने ७-७ मिनट के बजाने शुरू किया. सारे लोग डांस floor भाग खड़े हुए परन्तु श्रीमती बिष्ट ने मोर्चा नहीं त्यागा.क्यूंकि उन्हें DJ से हमदर्दी हो गयी थी. श्रीमती बिष्ट का कहना था कि सारे लोग DJ को दोष दे रहे है पर कसूर उसका नहीं है क्यूंकि वो तो सिर्फ लोगों के फरमाइश किये हुए गाने ही बजा रह है. लेकिन सात सात मिनट लम्बे गाने. गर्रर! खैर DJ का tortue बदस्तूर जारी रहा!


फ़िल्मी गानों पर डांस हो ही जाता है. हम लोग भी लगे रहे और आखिर तक डांस करते रहे. खूब मज़ा आया.


अगले दिन मेरा बिष्ट, महादेव और दुबे का वाटर पार्क जाने का कार्यक्रम बना. नहा धो कर जब हम तरणताल पहुंचे तो वह पर दो-तीन बड़ी बड़ी फिसलन पट्टियाँ बनी हुई थी. हम लोग तीन मंजिल चढ़ कर, जहाँ से वह शुरू होती थी वहां पहुँच गए. एक छोटी से बालिका हमारे पीछे खड़ी हुई थी तो शिष्टाचारवश हमने उसे आगे जाने दिया. इस चक्कर में हमने उस water slide कि health and safety guidelines पढ़ के भी अनदेखी कर दी और बाकी तीनो ने उस तरफ धयान भी नहीं दिया.

मेरी बारी आई तो मैं एक DON  कि तरह अपनी position ले कर slide  करने निकल पड़ा. शुरू में सब ठीक था, पंरतु एकदम से slide 90 डिग्री के angle पर हो गयी और मेरा मानसिक संतुलन भी असंतुलित हो गया. मैं प्राथर्ना करने लगा कि यह torture जल्दी ख़तम हो. Slide ख़तम हो रही थी, तो जैसे धरती सूरज के चारो और चक्कर लगाती है वैसे ही मैं पानी के कुएं में गिरने से पहले एक बड़े से Drum में चक्कर खा रहा था. इतने में ही ढुप करके पानी में गिर गया. ज्यादातर ऐसे में  पानी कम गहरा होता है परन्तु यहाँ बहुत गहरा था. मेरे पांव तले को ढूँढ़ते ही रहे लेकिन मैंने एक दो हाथ मारे और मैं बाहार था. 

मेरे पीछे पीछे बिष्ट जी आ रहे थे, मुझे लग तो गया था की  बिष्ट जी गंभीर समस्या में आने वाले हैं क्यूंकि उन्होंने चेतावनी की  तरफ बिलकुल  भी ध्यान नहीं  दिया था. मैंने  पीछे मुड के देखा तो लाइफ गार्ड अलार्म बजा के पानी में बिष्ट जी की जान बचने के  लिए कूद रह था. जब मेरी नज़र पूल में गयी तो मैंने देखा लाइफ गार्ड बिष्ट जी की गर्दन पकड़ कर बाहार निकाल रहे था. 

हमारे पीछे पीछे महादेव आ रह था और यह सुनिश्चित था की वो भी इस गहरे पानी में डूबने वाला था. और वही हुआ, महादेव पानी में गिरने के बाद बदहवास हो गए और उन्हें बचने के लिए भी slide को स्टॉप करना पड़ा,  अलार्म बजाना पढ़ा और rescue करना पड़ा. 

महादेव का चस्मा भी पूल में गिर गया. बिष्ट जी तिलमिलाए हुए थे की डूब कैसे गए, और माथे पे लगा दाग मिटने के लिए दुबारा slide पर जाने की बात करने लगा. पीछे पीछे दुबे जी आये और कहने लगे की ऊपर की लाइफ गार्ड ने उन्हें नीचे भेज दिया, यह कहकर की तुम्हारे दो दोस्त नीचे डूब गए है और यह slide
अब बंद हो गयी है. महादेव भी इश्वर का धन्यवाद कर रह था की जान बच गयी, बिष्ट जी अभी भी कलंक धोने की बात कर रहे थे और मैं मन ही मन मुस्करा रह था ..

Wednesday, October 27, 2010

Rohini turns one!

Nanu and Nani decided to host the party at Zum Inder which is the most suitable venue for these kind of celeberations. The menu was kept simple: 3 starters to include seekh kebab, fish pakodas and vegetable samosas, the main course was comprised of lamb curry, chicken kali mirch, rice pilaff, chole paneer and paranthas.

Cake for the ceremony was finalised by the big boss and it turned out to be a strawberry cake with princess photo decoration on it.

Party's theme was suppose to be a disco night but as it happens in most of the cases the dress code is tough to implement. Most of the family members stuck to the dress code and were looking fabulous in their respective attires including me :)
proud family




proud and happy parents
nanu and nani


In order to bring some fun to the party I ensured that disco songs from 80s were played as DJing was mostly done by me and assisted by Rohit and Navnit. Ruppy rocked the bar and churned out rocking mojitos one after another. There were few casualities as well as a result of few dodgy mojitos (victims can post their comments in the end).

There was a bollywood quiz to entertain the guests which was duly won by Nany and Nanu as it was found out that Rupy cheated by leaking out the questions and few of the participants were indulged in googling the answers.
The chief person ( Rohini) maintained her composure throughout the party and looked stunning in her red dress.

hamaar bitia raani

It was a fun evening and the one to be remembered for always.
Finally a big thank you to Khurana uncle and Abbi family for making a visit for the birthday. Thank you to Papa and Mummy for sponsoring the party, special thanks to Navianny, Rabu, Ruppy, Nany and the rest for making the party such an entertaining affair.
ruppy and puppy
Abbi family
Gaddu and Pappa lahri

Disco maasi and massad

Saturday, September 25, 2010

माताश्री का इंग्लैंड आगमन

मम्मी छुटपन में मुझे श्रवण कुमार की कहानी सुनाती थी, शायद इसके पीछे उनकी यही मंशा रही हो की उनका बेटा भी श्रवण कुमार ही निकले. अब यह कहाँ तक सही हो पाया यह तो वही जाने.

मेरी यह हार्दिक इच्छा थी की अपने साथ साथ अपने परिवारजनों की भी जगह जगह भ्रमण  कराऊँ. मम्मी को इंग्लैंड घुमाने का प्रयास मैं काफी समय से कर रहा था परन्तु यह २०१० की गर्मियों में जा कर ही साकार हो पाया. अन्तंत माताश्री जून २०१० को इंग्लैंड के हीथ्रो विमानपतन तक पहुँचने में सफल हो ही गई.

माताश्री को इंग्लैंड बहुत पसंद आया. विशेषत: यहाँ का साफ़ सुथरा वातावरण और अनुसशित नागरिक. माताजी का इंग्लैंड प्रवास तक़रीबन तीन महीने का था और इस दौरान मेरा प्रयास यही था की मैं उन्हें ज्यादा से ज्यादा पर्यटन स्थल दिखा सकूँ.
thames नदी की किनारे 

गोल्डेन eye

लिसेस्टर मिष्टान की दूकान 
झील की kinare
mummy jee at Jimmy Spices Sutton
माताश्री पाक कला में सिद्धहस्त है, उन्होंने  तरह तरह के स्वादिष्ट व्यंजनों से हमारी उदर पूर्ती कराई. खासकर के पोहा, साबूदाने की खिचड़ी, संभार, कश्मीरी गोश्त , लाल गोश्त इत्यादि इत्यादि.

मम्मी का हमारी सुपुत्री रोहिनी के साथ अच्छा समय व्यतीत हुआ और रोहिनी सिर्फ दादी के हाथ से fruits खाती थी.
मम्मी का दूसरा सबसे ज्यादा समय television के सामने कटा.   
Mummy and Rohini in front of our beloved TV

क्यूंकि मैं भी टीवी का बहुत बड़ा चोर हूँ, इसलिए अगर टेनिस के matches आ रहे हो तो मम्मी को जबरन देखने पड़ते थे, परन्तु इस चक्कर में मम्मी राफेल नदाल की फेन बन गयी, जबकि मैं फेडरेर का फेन हूँ. मम्मी ने पूरा Wimbledon  देखा और पूरे टूर्नामेंट के दौरान नदाल को support करती रही और सारे matches देखे.

एक दिन टीवी में BAAGBAAN फिल्म आ रही थी. मैंने कहा भी यह फिल्म न देखो बड़ी रोने धोने वाली है. परन्तु मेरी बात कौन सुनता है. अकेले बैठ कर देखती रहीं, जब मैं आया तो देखा रो रही थी.
मैंने कहाँ अब क्या हुआ? 
तो बोली, अमिताभ का चस्मा टूट गया है और उसके बेटे बना के नहीं दे रहे है.
मैं सोफे पर बैठा तो वहा चस्मा पड़ा हुआ था, और मेरे बैठने से टूट गया.
मैंने कहा, आपने जान के यहाँ रखा होगा, ताकि जान सको की मैं चस्मा ठीक करवाता हूँ या नहीं?
मैंने चस्मा ठीक करवा दिया, अगले ही दिन, नहीं तो BAAGBAAN फिल्म तो अपना काम कर गई थी.



अब तो यही प्रतीक्षा है की मम्मी जल्दी से जल्दी वापस इंग्लैंड आये और हम सब के साथ आनंद से रहे.
Oye, Mummy daa puttar!

mummy endorsing coke

Tuesday, September 21, 2010

Finally I manage to beat Navneet in pingpong!

Table tennis is one of my favourite games and I have been losing to Navneet for more than a year now (that too convincingly). Altough I am not a bad player but Navneet plays a heavy spin game and always managed to beat me until 20th of September,

I finally decoded the formula of success. Navneet plays left handed which means that a different strategy is needed when playing against him. His forehand is a backhand for a rightie and vice versa. Also his serve was unreturnable because of the heavy spin in it. The plan was simple and it was to play Navneet on his backhand which he normally does not get to because most right hannder plays on  the other corner which is the backhand for righties. Second was to neutralise his attacking game with boring slice and defensive tactics.  Third and most important was to read his serve and neutralise it to keep the ball in play.

I am also attaching a video, it is not that great watch as we were playing after a gap of six months but I hope that it will make a good viewing, so enjoy! 
http://www.youtube.com/watch?v=3vBqystwy8E

Monday, September 6, 2010

Wonder years

me reciting the poem
Eleventh class is a watershed moment in every child's life and so was ours. Parents had high hopes from me in the board exams but I was too busy in playing cricket matches during preparation holidays and that reflected in my result. Fortunately, I got enough percentage to sit in the science class. 

Well Section A and then Science class!  It was a combination to give superiority complex to anyone. All me life I studied in the section C (basically all the good for nothing student's section). To my credit, I was the 'अंधों में काना राजा'! The studies were not too bad and extra curricular activities contributed towards getting famous in school. I once recited the Hindi poem  " सतपुड़ा के घने" and that feat gained me the almost recognition.

This was the moment of reckoning and beckoning. We were progressing towards adulthood. We had a 3 months long holiday celebrating the culmination of board exams. We were told that the 11th is ' take it easy' and no one should work hard. I had chosen all the subjects Physics, Maths, Bio, Chemistry and English as there was no counselling available and everyone did what everyone else did.


During the early days of XIth class, our first class was taken by  Vikramidtya sir (popularly known as physicuu sir).He discussed the function of x, function of y, scalar quantity, vector quantity and 'hence proved' the theorem. Everything was going bouncer but who cared, we were enjoying the early days of freedom. We never had full set of teachers, there were few adhoc teachers and our maths sir (Mr. Kochar) was always busy in the adminstartion of the school. Our English teacher Ms Mehta was a very rude teacher and she always used to derive pleasure in humiliating and putting down students. I never liked attending English class and always wanted to avoid it and that probably was one of the reasons that inspite of doing my studies with an English medium school I hardly managed to speak any English. 

Now let me talk about my fellow students. As I said before that I was happy to be in section A because it symbolized the success, winning and feeling superior. All the thick and lowly ranked students were chaffed and were forced to take the arts because to study science you needed to score above 60%. In other words studying science was the prerogative of 'bourgeoisie' and arts students were 'proletarians'. 

There were few old faces like Amit Garoo, Sugan, Ashok Maurya, Dinesh Gupta, Vineet Saxena and Meeta. They all were the bright students from the 10th A class and had the proven track record in the studies. Nitin, myself and few others have made the jump from C. In addition there was a group of students from KV no. 2 because their school had classes only till 10th. That group included the likes of Ekansh, Ravi Yadav and Sukhi (flying sikh).


dontknow, nitin mudgal, dont know, ekansh jain, dont know, sandhu, sandeep salathia, nitin sharma, vishal varma, cant recall, abhishake, dinesh gupta,amit garoo, hardeep, amitabh khajuria,2nd row: atul barara, neeraj sisodhia, vineet saxena, suhas dalvi, naryan, chitan, sugan, sanjay gupta, gaurav pandey, ravi yadav, sukhi, mayank, amit, (girls will be tagged by garoo)


Being a KV, every year we used to get new influx of students which meant that every year I used to fall in love (specially at the beginning of the session). I used to be very organised during opening days as my main aim used to  impress the new girls (never succeded). This also meant that we had several new students which included the likes of JV Singh, Atul Barara, Deepika Sirohi, Sushant, etc.

As there were never enough teachers to taught us so either we were playing in the assembly ground or creating rucus in the class room. I remember that because of the noise we were making, Kochar sir made us to stand on the assembly ground as punishment. Though I doubt that it actually had any effect on us. 

The studies were getting neglected and without proper guidance our basics were also getting weaker (for which we all paid dearly after passing from the school). We had the first unit tests and almost everyone failed including the brightest of students ashok, garoo, meeta etc. That result made few students serious towards studies and some of them even started to prepare for IIT exams. I did not even know what IIT meant at that time. 

Then came the sports meet time and selection trials were happening. Sugan used to be the star sports person of the school and as 12th class students are not allowed to take part in sports, we had a free reign. I got myself selected in TT team, Garoo was in cricket, Ashok in football and Jodhvir in TT and Badminton. Most of the contingent was comprised  of सिफारशी टटू. 

The regional meet was in Jalandhar. We all packed our sleeping bags, suitcases and boarded the bus to Jalandhar. It was  a fun trip as we were nearly 50 students of same age and all were going to play. Our bus left us in the Jalandhar city, and we needed to made arrangements to go to Cantt. Our teacher got us boarded in a tractor which was carrying the gobar a trip before. The tractor was smelly and we were put in it like bhed bakris. That short journey is so memorable that I still  remember that one.

Finally we reached our destination and as we were settling down, we were told that 100m trials were going to start. Our super star racer was Rajesh Jha from the arts section. We all went to see the race. Our candidate( Rajesh) came last and that was just the start. By next afternoon 3 pm almost the whole contingent was out of their respective events except Ashok and Garoo. This meant that we had full 2 days to our disposal without participating in any event. We utilized that time very judiciously in knowing the city and roaming around.

After coming back, we were having auditions for youth parliament. As I was one of the good speakers in the school, Narender sir chose me to play the opposition member. Everyday we use to have one hour rehearsal in practising for parliament session and it also meant that I had one hour extra break from studies. To be frank I do not remember studying much in the 11th section. My scores kept getting worse to worst and I was moving away from the studies.

to be continued

Thursday, January 21, 2010

Goa to Lucknow-1997 An unforgettable trip.

This is the third and final part of our  job hunt.  The other 2 parts are written in hindi in my blog gauravthepandey.blogspot.com

Well, our trip to Goa also rendered fruitless. We both had full masti for a week with Chaube and Athar sir. As I was a  tetoaller at that time so I stayed away from booze however Raka had full masti and maza sponsored by our two loved seniors. Although Deepankar Chakarvati was also there but we did not have much interaction with him as he was more busy in chasing birds (that’s what he was famous for in the college).
The days of departure were coming nearer, we had a booking in Goa express and our waiting list was 242 and 243. I worryingly asked Raka,”Yaar, yeh ticket to confirm ho jayega na?”


He said ,”abey, सब  हो जायेगा .” BY now I have been seriously fed up with Raka’s attitude of SAB HO JAYEGA. I was tolerating it for past 3 years, even while making the project report  for final year assessment technically we were a group of 3 but the rest 2 (Raka and Sanga) did nothing. I yelled back at him ,” भूतिनी  के  कैसे  हो  जायेगा , धरती  फटेगी  या   आसमान ”!!


Anyways, kuch nahi hua, our ticket remained on waiting list only, which meant that we had to do the 36 hours of journey without booking. The western railway was constructing some mega project at that time hence the Goa express was starting from a small town in Karnataka called Launda (funny name, isn’t it). This meant that first we had to go to Madgaon then to Launda then to Jhansi and then to Lucknow.

We started our journey at 10 am on 18th of May, we reached Madgaon from there we took a KSTC bus to Launda, our luck was going strong so bus broke down at the halfway .We were sitting comfortably on seats and  now we had to change the bus. We managed to get another bus, as it was packed we had to do the remaining 2 hours of journey standing. We managed to reach Launda just in time the train was on the platform and to our surprise it was not very crowded.


Usually trains are crowded in India specially if you are travelling in general compartment. As our tickets were not confirmed, we had no other option but to take seat in general bogey. We occupied 2 windows seat facing each other and were feeling very relaxed assuming that now we might be able to travel comfortably, WE WERE WRONG!


Train left at the scheduled time from Launda, next station and lot of people boarded our bogey. After 2 hours it stopped again and more people came in. It was jam packed by now and guys who are aware square close packing, our bogey had reached in that state. After 2 hours it stopped again somewhere Belgaum or someplace like that and more people got stuffed in at that one bogey. Now it was like RATI BHAR KI BHI JAGAH NAHI THI.

We had dozed off by then but I had the emergency and had to go for लघु शंका निवारण  . I looked around and toilet was like after 4 rows but there was no way on this earth that I could have reached to the toilet. I only had one way which was to become हनुमान जी I somehow managed that in approx half an hour. I was exhausted by now and various kinds of smells were emanating in the coach. In a seating of 72 people there were around 300.




I spoke to Raka and told him that whatever happens we are getting out this coach at next station. We will sneak in to any of the reserved compartment and will bribe the T.T. We should had done that earlier but because of our financial condition we were trying to save money.
Next station was Daund, we got out of that hell and boarded the next coach and to our surprise it was not that packed and we even found an empty birth.  We both managed to sleep on that one sleeper birth and did not wake up until Pune.


One Indian Air force Pilot was sleeping on the birth above us. In the morning CHAIWALLAS and AKHABAAR WALLA  all started to come in. Now, I was feeling as having a normal railway journey. We asked the pilot guy as how come this dabba is not that packed. He told us that all the passenger in this coach had a reservation in AC first class somehow this train did not have one so they all have been transferred to this. Finally our luck was smiling. We travelled stress free till Bhopal as no ticket checker came till then.


At Bhopal some Muslim family boarded the train and  there were seven of them parents and  4 daughter and youngest was son (who must have been the fruit of his parent’s hard work and patience). Well, I think she was the eldest Rukshana, that's what her name was. She asked me if she canget  some space to sit. The space is precious on a train and should not be given easily and this space we had got after lot of hard work so I said ,” this seat is ours but I can let you seat”.


After a while ticket checker came, he asked for the tickets and on seeing that he said ,”empty this now and go to the general compartment or I will penalise you). Now, the tables were turned as it revealed that the father of Rukhsana was a railway employee and this seat was his. It was our turn to make a request if we can get little bit of space which she granted.



It had been nearly 2 days since we had wash but Rukhsana asked me if I was a Muslim? I asked why?
She replied,” oh, you look like Salman khan!  I kind of thought I should not take shower everyday as I will  be as handsome and good looking as Salman by sticking to the ritual of bathing once in three days. Wow, brilliant idea! There was chemistry going on between me and her but then train approached Jhansi and the time had come to leave Goa express.

to be continued:


Sunday, January 17, 2010

बम्बई से गोवा



कॉलेज पास करने के पश्चात हम अब बेरोजगारों की श्रेणी में आ चुके थे. कॉलेज के होनहार छात्र एवं छात्राये अच्छे पदों को प्राप्त कर चुके थे और हम जैसे निखट्टू मैं, राका, नथु, सांगा अभी भी दर दर की ठोकरे खा रहे थे. जॉब हंट के लिए मेरा और राका का अगला पड़ाव सैलानियों की राजधानी और कबाब, शबाब और शराब की जन्नत गोवा था!

हमारा गोवा जाने का उद्देश्य सिर्फ नौकरी की तलाश ही नहीं अपितु सैर सपाटा भी था. अब तक मैं सिर्फ समंदर के सपने ही देखते आया था और अब उसको असल में देखने का समय आ गया था. (वैसे समंदर बम्बई में भी है परन्तु गोवा वाला मज़ा नहीं है! )

हम दोनों की आर्थिक स्थिति तो कुछ खास अच्छी नहीं थी, मेरे पास शायद ७००-८०० रूपए होंगे और राका मुझसे भी ख़राब अवस्था में था. भाइयो और बहनों उस समय ए टी म कार्ड नहीं होते थे अर्थात अगर पैसे ख़तम हो गए तो भीख  मांगनी या फिर बर्तन मांजने पड़ते.

खैर हमने सबसे सस्ते जाने के चक्कर में दादर से जाने वाली कदम्बा ट्रावेल्स की टिकेट खरीद ली और दिन के ढाई बजे बस में जा के बैठ गए. वैसे तो बस का सफ़र १४-१५ घंटे का था और अगले दिन सुबह ७ बजे का गोवा आगमन था. राका पहले गोवा जा चूका था लेकिन मेरी पहली ट्रिप थी और मेरा दिल  भीतर ही भीतर कुलांचे मार रह था.

सब कुछ बढ़िया चल रह था. बॉम्बे से गोवा का रास्ता बड़ा ही मनोरम है भले ही आप ट्रेन से जाये या बस से. गोवा पहुँचने से ठीक दो घंटे की दूरी पर हमारी बस ख़राब हो गयी. मालूम पड़ा कदम्बा ट्रावेल्स के लिए ये कोई नई  बात नहीं थी और अक्सर ऐसा होता रहता था. बस को ठीक होने में ४ घंटे लग गए और हमें  अपने गंतव्य बानोलिम बीच  तक पहुँचने में अगले दिन के ढाई बज गए.

गोवा में हमरे कुछ seniors लीला होटल में कार्यरत थे - अथर  एंड चोबे सर...., राका ने जुगाड़  करा रखा था और हमारे रूकने का इंतजाम  इन्ही के पास था. चोबे सर ने हमारा गरम जोशी से स्वागत किया और हमें  यकीन दिलाया की चिंता करने की जरूरत नहीं है, आराम से रुको और नौकरी खोजो.

गोवा पहुंचते ही में बावला हो  गया और समन्दर का नीला नीला पानी देख और श्वेत रेत को  देख बौरा सा गया. मैंने राका से कहा भाई सबसे पहले हम तैरने जायेंगे. हमने अपने अपने कच्छे  पहने और दौड़ चले समंदर की तरफ जोकि चौबे सर के घर से पल भर की दूरी पर था.

सूरज चमक रहा था, समंदर का नीला पानी और सफ़ेद रेत   मुझे चीख चीख के पुकार रही थी.... आओ  और आके मेरा आनंद लो. मैं दौड़ता हुआ पानी में घुस गया.  यह क्या!   मेरे मुंह में नमकीन पानी चला गया.  एक ज़ोर की लहर आयी और मैंने गोता खाया और पानी पीया. इतना अनुभव बहुत था. समंदर को लेके मेरे मन में जीतने सुन्दर स्वपन थे सब चकनाचूर हो  रहे थे.

मैंने कहा भाई राका चलो मज़ा नहीं  आ रहा है.
राका बोला : का हुआ बे, तुम तो बहुत उतावले हो रहे थे पानी में कूदने के लिए, अब तैरो.
अबे ज्यादा चै चै न करो और चलो.., दीमाग मत चाटो साले  ......

पानी से बहार निकलते ही किनारे की रेत पैरों से चिपकने लगी, सोचा की घर आके नहा लेंगे इसलिए सीधे घर ही आ गए. घर पहुंचे तो हर जगह रेत ही  रेत हो गए.
चोबे सर बोले: अबे क्या कर रहे हो तुम लोग, सारे घर की वाट लगा दी हैं.
सॉरी सर, अभी साफ़ कर देंगे.

कच्छा उतरा तो और रेत निकल आयी, बाथरूम पूरा रेत से भर गया, नाली  ब्लाक हो गयी. चोबे सर को मालूम पड़ा तो आग बबूला हो गए. और बोले
" अबे राका यह किस नौटंकी को पकड़ लाये हो बे"

वो दिन है और आज है मैंने फिर कभी समंदर स्नान का नाम नहीं लिया और मन ही मन कह " भैया हमरी गंगा  जी ही  सबसे बढ़िया है, निर्मल शीतल मीठा और बिना रेत का जल.

गोवा आने का प्रयोजन तो नौकरी खोजने आये थे लेकिन राका बड़ा ही निकम्मा था और सिर्फ मौज मस्ती के लिए है उसमे फुर्ती  आती थी. हम एक सप्ताह गोवा रहे और हमने घूमने और लफंदर गिरी के सिवा कुछ और नहीं किया.

जाने  के  दिन करीब आ रहे थे और फिर से नाकामी हमारे साथ चलने को  तयार थी.

जारी रहेगा ........

Friday, October 30, 2009

Rohini- Apple of her daddy's eyes


I am a Dad now!




Things are changing fast, Ginny and myself are blessed with a baby girl. This is what we wanted all along. It is a wonderful feeling and I feel so proud to be dad of newly born sweet ROHINI.

After a long thought process I arrived on the choice of name for our daughter. Ginny gave me the privilege of naming the first child although she bore the pain of delivering her. Being women is great and to be mother is greatest. I salute my wife for going through all the pain to bring young one into the real world. Rohini rings an Indian mythical bell in the ears of the listener, it is a traditional Indian name which is related to NAKSHTRAS and the creation of earliest life on our planet. It also means rising to the existence.

On the day of her birth, I was having the intuition of fathering a female child. I was expecting my sister in law to ring me and announcing that now I father a baby girl. This is exactly what happened. On 19th Oct at 2:55 pm our sunshine arrived. I am so happy on this defining moment of our life and expect life to change in a big way.

Friday, July 10, 2009

भारतीय रेल लखनऊ से बॉम्बे -2

लूका ने हमरा काफ़ी गरम जोशी से स्वागत किया और घोषित कर दिया की अब वो हमारा official गाइड है। लूका हमसे पहले बॉम्बे आ चुका था और यहाँ के बारे में काफ़ी कुछ जानता भी था।


"भाई लोग, एक बात बता देता हूँ, अक्खा मुंबई वडा पाँव खा के जिन्दा रहता है, इस शहर में अमीर से अमीर और गरीब से गरीब मज़े से रह सकता है "।
मेरे लिए यह सब स्वपन सा प्रतीत हो रह था और मैं मंत्रमुग्ध सा लूका का प्रवचन सुन रिया था।

लूका ने हमारे रूकने का इन्तेजाम ग्रांट रोड में किया था और कह रह था- मैं तुम्हे यहाँ इसलिए रूका रहा क्यूंकि यह जगह टाऊन से बेहद करीब है। बड़ा ही घटिया होटल थी और हम सब एक बेड का १०० रु रात्रि दे रहे थे। उस समय हमे मालूम नही था की ग्रांट रोड बम्बई के सबसे बदनाम इलाको में से एक था, लेकिन रात ढलते ही हमे इस बात का कुछ कुछ आभास सा होने लगा था.....


अबे राका यहाँ की सड़के देखो, कितनी चिकनी है!! साला लखनऊ में हो तो आदमी सो जाए...

लोकल ट्रेन में बैठे तो बावले ही हो गए और डंडो से लटक लटक एक जगह से दूसरी जगह बंदरो कीतरह उछाल कूद मचने लगे।
बॉम्बे की पहली रात ऐसा प्रतीत हो रहा था की कभी ख़तम ही नही होगी, हम लोग मालाबार हिल से चोपाती, फिर गेटवे ऑफ़ इंडिया फिर कही और फिर कही....,

लूका ने हमारे लिए एक दो जगह बात चला कर राखी हुई थी। अगली सुबह हम एम्बेसडर होटल पहुँच गए। वह पहुंचे तो मैं अपना resume होटल ही भूल आया था और मुझे लगा की अब सब गुड़गोबर क्यूंकि उस दिन जमा करने की आखरी तारीख थी। मैं डरते डरते ट्रेनिंग मेनेजर के ऑफिस गया। वह एक साफ़ रंग की साधारण से नाक नक्श की आकर्षक महिला थी, मुझे वो पहली ही नज़र में भा गई। पर उस से क्या, मुझे तो हर सुंदर लड़की भाती थी, उन्हें मैं नही भाता था। परन्तु वह क्षण मेरी जिंदगी का turning पॉइंट साबित हुआ। जेस्सी नाम ता उसका, वह बोली- तुम अपना resume परसों ले आना.

राका मेरे साथ आया था, पर वह कभी भी इन चीजों के लेकर गंभीर नही रहा। सांगा और नथू को विदेश जाने का चस्का था इसलिए वो एक एजेंट के चक्कर में बोरी बन्दर के चक्कर पे चक्कर काट रहे थे।

मेरे सितारे बुलंदी पर थे, मैंने स्क्रीनिंग टेस्ट पास किया, फिर सामूहिक विवाद में सबके छक्के छुडा दिए और अन्तिम सूचि में आ गया। परिणाम घोषित २ हफ्तों के पश्चात होना था इसलिए वह से निकले और वडा पाव भास्काया (हम तो गरीबो की श्रेणी में ही थे) और नये ठिकाने की तलाश में निकल पड़े।

मम्मी ने एक ताऊ जी का फ़ोन नो दिया था, सोचा किस्मत आजमा लू। फ़ोन किया तो उन्होंने पहचान लिया और अपने घर पर रूकने का आमंत्रण दे दिया। अभी आगे गोवा भी जाना था इसलिए कम से कम पैसो में गुजरा करना था। मैं और राका बोरिया बिस्तर ले ताऊ की पास जा धमके. सांगा और नथू , लूका के पास जा कर रहने लगे।

मेरे लिए यह आखरी अवसर था और मैं इसे व्यर्थ नही करना चाहता था। हम दोनों ने रात देर तक होटल लीला के interview की तयारी करी और भोर की प्रतीक्षा करने लगे।


एक है अनार और सो है बीमार!! लड़के लड़कियों की भीड़ आई हुई थी वह पर। मुझसे कहा गया आपको मीठा व्यंजन बनाना होगा। मैंने शेफ कोट डाला और pastry डिपार्टमेन्ट जा कर अपने हुनर को अंजाम देने की कोशिश में लग गया। इतना घटिया बनाया की मुझे उस दिन ही ज्ञात हो गया था की चाहे सूरज पश्चिम से उग आए, मैं चुना नही जओंगा।

लीला वाले बड़े ही हरामी थे, पूरा दिन हमसे काम कराया और चाय के लिए भी नही पुछा।

दिन के तीन बज चुके थे और हमारे भूख के मारे बुरे हाल थे। हम लोग अँधेरी स्टेशन की तरफ़ चलने लगे, बीच में एक चाय की दुकान आई थो सोचा कुछ नाश्ता कर लिया जाए।

-भइया २ चाय और २ प्लेट पकोडे देना।
-पकोडे नही है।
-हैं, तो वो बहार टोकरी में क्या रखे हो?
- वो!। वो तो भजिया है।


मेरी जान में जान आई, हमने कहा - हा भाई वही, हम लोग इसे पकोडा बोलते है।

बॉम्बे का पडाव अपने अन्तिम चरण पर था, जॉब hunting के लिए अगला शहर tourism कैपिटल ऑफ़ इंडिया यानि की गोवा.............

Monday, June 15, 2009

भारतीय रेल -लखनऊ से बॉम्बे 1997



पुष्पक एक्सप्रेस platform संख्या १ पर खड़ी थी. लोगो की भीड़ से platform खचाखच भरा हुआ था. लखनऊ से बॉम्बे जाने के लिए ट्रेन छोटी लाइन के ही स्टेशन से चलती है. इसको छोटी लाइन कहने के पीछे भी एक कारण है वो यह की पहले पहल यहाँ सिर्फ meter gauge के पटरिया थी और सिर्फ छोटी गाडिया ही चली करती थी. गाड़ी के चलने का समय होने वाला था. राका, सांगा और मैं अपनी पहली नौकरी की खोज में बॉम्बे के लिए रवाना होने के लिए गाड़ी में अपना अपना स्थान ग्रहण कर चुके थे. सपनो के साकार होने का शहर अर्थात बॉम्बे या फिर १९९२ के बाद का मुंबई, हमे बुला रहा था. platform पर omelete के स्टाल वाले गला फाड़ फाड़ के यात्रियों को अपने अपने ठेले की तरफ आकर्षित करने की कोशिश कर रहे थे. चूँकि मुझे शुरू से ही अंडे बेहद पसंद रहे है इसलिए इस से पहले पुष्पक एक्सप्रेस अपने गंतव्य के लिए प्रस्थान करती मैंने फटाफट 30 रुपैये दिए और तीनो दोस्तों के लिए ब्रेड अंडे का इन्तेजाम कर लाया.

मुझे रेल यात्राओ में बेहद आनंद आता है और यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी की यह मेरी एक हॉबी में से है. यात्रा शुरू होते ही मुझे खिड़की पर बैठना अनिवार्य है. ट्रेन का शहरं से बहार निकलना और धीरे धीरे सांझ के ढलते ढलते आबादी से वीराने की तरफ कदम बढ़ाना कही न कही हमारे अपने सफ़र की तरफ भी इंगित करता है. ट्रेन की पटरियों के साथ साथ चलती हुई वो गलियां, उनमे चलती हुई सायकलें और रिक्क्शें, अनपूते हुए मकान, उनके ऊपर लगे हुए टीवी के antennae ............. सारी तसवीरें मानों दीमाग की फोटोग्राफिक memory में कैद है.

ट्रेन ने धीमी रफ्तार छोड़ अब तेज रफ्तार पकड़ ली थी और खेतो को पीछे छोड़ती हुई सरपट आगे बाद रही थी. रात्रि की कालिमा अब धीरे धीरे बच्ची हुई रौशनी को अपना ग्रास बनाती जा रही थी. हम तीनो नीचे वाली बीरथ पर ही बैठे थे और बतिया रहे थे और ब्रेड अंडे का आनंद ले रहे थे, तभी वहा से चाय वाला निकला. ट्रेन में बैठो और चाय न पी जाये. भोजन के साथ साथ हम पानी ज्यादा और दूध कम चाय की चुस्किया लेने में जुट गए.

उन्नाव जंक्शन आ गया था और कुछ देर में गाडी गंगा मय्या को पार भारत के सबसे प्रदूषित शहर कानपुर में प्रविष्ट करने वाली थी. रात के नौ बजे के आसपास गाडी कानपुर पहुंचती थी और आधा घंटा रूकती थी. कानपूर से गाडी लगभग लगभग पूरी भर जाती थी. कुछ परिवार तो कुछ विद्यार्थी जोकि अपनी छुट्टियाँ ख़तम कर वापस पढने जा रहे हो या businessman वगेरह वगेरह अपनी अपनी सीटो पर विराजमान होने की जद्दोजहद में लगे हुए थे.



" भाईसाब, यह सीट आपकी है क्या?"
खाली करिए इसे!
टीटी को बुलाऊ क्या? देखिये मैं बड़े प्यार से कह रहा हूँ आप मेरी सीट खाली कर दी जिए!
अजी, बड़े बदतमीज़ इंसान है आप!
शायद आपको मालूम नहीं है, यह रिज़र्वेशन डब्बा है. यहाँ वेटिंग लिस्ट नहीं चलता है!

यह सारे संवाद आम है और मेरे ख्याल से हर यात्रा में आप को सुनाने को मिल जायेंगे.


कानपूर से सरकने के पश्चात निद्रा की गोदी में विलीन होने का समय आ गया था. सांगा ने ऊपर वाली, राका ने नीचे वाली और मुझे मिली बीच वाली बीरथ. मैंने पढने के लिए कुछ magazines ली थी, ,कान में वॉकमैन लगाया और पढ़ते पढ़ते सो गया. सुबह आँख खुली तो पौ फट चुकी थी और चाय वाले, अखबार वाले कोलाहल मचा रहे थे. अपनी सुबह newspaper पढ़े बगैर नहीं होती है इसलिए दैनिक जागरण की एक कॉपी ली और स्पोर्ट्स पन्ने पर नज़र घुमाई. गाड़ी भोपाल स्टेशन पर रुकी थी और सुबह की ठंडी ठंडी हवा चल रही थी. दोनों मित्रगन भी उठ गए थे और समय आ गया था की बीच वाली बीरथ फोल्ड करी जाए और बैठने और बतियाने का इन्तेजाम किया जाये. अभी पूरे १२ घंटे का सफ़र बाकी था. हमने गाड़ी से उत्तर के ज़रा माहोल का जायजा लिया ताकि कहने को तो हो - हा भाई हम भी भोपाल जा चुके है.


मध्य भारत में पटरियों का जाल अच्छा बीचा हुआ है और लगभग पूरा route इलैक्ट्रिक एंड डबल लाइन है, इसीलिए गाडिया इस क्षेत्र में अपनी पूरी स्पीड से चल सकती है. अब समय आ गया था रेल के दरवाज़े पर खड़े होने का और हवा खाने का. गाडी अपनी पूरी रफ़्तार पर थी और हम तीनो, दो एक दरवाज़े पर और सांगा दुसरे दरवाज़े पर खड़े हुए हवा से बतियाने का प्रयास कर रहे थे. मध्य भारत का भूगोल उतारी भारत से थोडा अलग है यहाँ पर हरियाली भी है और छोटे छोटे पठार भी है, इस दौरान गाडी काफी सुरंगों से भी होकर निकलती है और सर्प के तरह रेंगती हुई पर्वत श्रंखलाओं के मध्य से निकलती रहती है. चम्बल के डाकू यही कही आसपास पाए जाते थे।

गर्मी बढने लगी थी और पसीने छूटने लगे थे, ऊपर चलते हुए पंखे भी अब गरम हवा देने लगे थे. दोपहर के भोजन का वक़्त हो चला था, रेलवे कैटरिंग का नुमायन्दा आर्डर लेके जा रह था, हम लोगो ने भी तीन थालियाँ आर्डर कर दी. रेलवे कैटरिंग का खाना खाना भी अपने आप में एक अनुभव है और हर भारतीय इस से परिचित होगा. भक्षण के पश्चात हमने सोचा आराम किया जाये और ऊपर वाली बीरथ पर कूद कर पहुँच गए. बीरथ गरम हो चुकी थी और जैसी ही हम लेते हमरा मुह बीरथ के साथ चीपक गया (पसीने के कारण). हम भी दीठ थे इसलिए गर्मी की परवाह न करते हुए एक घंटे सो गए.

जब उठे तो गाड़ी के चक्कर लगाने का टाइम आ गया था, लम्बी यात्रा में यह अनिवार्य हो जाता है की देख कर आया जाये की बाकि डब्बो में कौन कौन बैठा है? और क्या कही आँखों के सेखे जाने का जुगाड़ है की नहीं? हम तीनो गाडी के टूर पर निकल गए......



" भाईसाब हमारे सामान का ध्यान रखियेगा हम जरा होके आते है." वापस आये तो गाड़ी में हिजडे धमाचौकडी मचाये हुए थे. हम लोग जैसे ही बैठे तो सांगा से पैसे मांगे तो वो कहता है की पांडू से लो, इस साले के पास बहुत माल है.



" हाय हाय, अरे मेरे सलमान खान, ला दस रुपैये दे दे!
सांगा बोला - तुम मुझे दस रुँपैये दे दो, जो बोलेगे मैं करूँगा
हाय हाय, हमारी तरह गाने गा कर सुनाएगा?
कौन सा गाना सुनना है?
सांगा ने अपना बेसुरा गला फाडा तो हिजडे ने भी तौबा कर ली और उसको दस का नोट पकडाने लगे, फजीहत होते देख सांगा ने पैंतरा बदला और मेरी तरफ़ वापस इशारा कर दिया। मैं बहुत खीज रहा था और काफ़ी गंभीर मुद्रा में आ चुका था.

वैसे हिजडों के साथ आप जिरह करो तो वो बदतमीजी पर उतर आते ही, पर सांगा काफी सुलझा हुआ लड़का था और वह उसकी बातो का बुरे नहीं मान रहे थे और काफी आराम से बात कर रहे थे. सांगा ने उनका रूख मेरी तरफ कर दिया और मुझे न चाह कर भी अपनी जेब ढीली करनी पड़ी.

शाम होने लगी थी और गाडी महाराष्ट्र दाखिल हो चुकी थी. फिर से नज़ारे बदल गए थे और यहाँ की गायो के सींग काफी लम्बे लम्बे थे. खेतो में फसल लहला रही थी. गाँव में ही असली भारत बसता है. किसानो की वैस्भुषा भी बदल चुकी थी और हर कोई गांधी टोपी पहना नज़र आ रह था. पुणे आ गया था और रिकॉर्ड बनाने की खातिर हमने प्लात्फोर्म पर उतर अपने कर्तव्य का निर्वाह कर दिया था।


फिर आया इगतपुरी, मतलब बॉम्बे का एंट्री पॉइंट. इगतपुरी स्टेशन पर बड़ी स्वाद कलेजी फ्राई मिलती है. यहाँ गाडी आधा घंटा रूकती थी, इसलिए हम लोगो ने पेट पूजा करी, और थोडी देर प्लात्फोर्म पर आवारागर्दी कर वापस अपनी अपनी जगह आ गए और कॉलेज के लड़कियों के बारे में विचार विमर्श करने लगे।





रात के सात बजे के आसपास हम बॉम्बे में दाखिल हो चुके थे। concrete जंगल और हर तरफ लोग ही लोग। हर तरफ अपार्टमेंट्स ही अपार्टमेंट्स नज़र आ रहे थे.

फिर दिखी लोकल ट्रेन और उसमे लटकते हुए और एक एक इंच पर खड़े हुए लोग। यह सब एक सपने के जैसा प्रतीत हो रह था, धीरे धीरे वो सारे नाम स्टेशन बोअर्ड्स पर लिखे दीख रहे थे, जिन्हें हम सिर्फ फिल्मो और टीवी में देखते हुए आये थे. ठाणे, कुर्ला, बांद्रा......

गाडी धीरे धीरे रेंगते हुए दादर स्टेशन पर रुकने जा रही थी, हम लोग अपना सामान बांध कर दरवाज़े की तरफ मुखातिब हो रहे थे। बॉम्बे में हमारे भविष्य के लिए क्या छुपा था बस इसकी कल्पना भर ही की थी......

पर अब असलियत को समझने और देखने का समय आ गया था।

लूका स्टेशन पर खडा हमारा वेट कर रह था..............

जारी....

Sunday, May 17, 2009

is it beginning of the end of nadal's regime

just checked BBC and came across a very good piece of news. king federer has beaten nadal in straight sets and astonishingly on a clay court. although nadal has been getting federer most of the times since his early losses to him but often he just sneaked win from the jaws of the defeat.

i have been an ardent fan of support of federer throughout, the reason is he is such a calm and composed player and never shows off, plus his shots are skillful rather than power. another reason is that i never liked pete sampras and federer was the one to end his reign.

at the same time, if we look from entertainment point of view, their rivalary has benefited the support and these 2 players have produced one of the fiercely contested matches in the recent past। i am sure that this win will give federer lots of confidence in overcoming the barrier of not beating nadal in previous 15 or so matches. in the last year wimbledon, federer was close to beating nadal but nadal pulled it out from the skin of his teeth.
one of my friend told me that john macnroe offered federer advice on how to beat nadal. i have watched few of nadal and federer's recent matches and i feel the nadal was getting a psychological edge over federer. in the wimbledon final, nadal played like a super human, esp in the later parts of the match. there were 2 or 3 returns in the end games which virtually seemed impossible but nadal made them. that basically broke federer's will and susbsequently losing that match. i presume that king has sorted him out and would return to his no 1 status again.


lets hope that federer will be able to continue his good form to french open and then on to wimbledon. hail the king- federer.

Saturday, May 16, 2009

एक परिचय मेरे दोस्तों का


कॉलेज के दिन भुलाये नही भूलते है, मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही है। मेरे ज्येस्थ भ्राता श्री का कहना है की मुझे राका के सिवा दूसरा कोई किरदार नही मिलता है क्या? पर में क्या करू, राका कैरेक्टर ही इतना दिलचस्प है की उसके किस्से ख़तम ही नही होते है। वैसे आज जब में सोचने बैठा तो मैंने गौर किया, वाक़ई हमारे आस पास कई सारे पात्र होते है जो हमारे साथ खुशिया बाटते है, हम्हे गुदगुदाते है, हमारा हौसला बढाते है और blah blah blah ........

ihm के तीन सालो में भी मेरी मित्रता ऐसे ही कुछ लड़को से हुई जिनका में विस्तार से वर्णन करना कहूंगा।

पहला साल तो बहुत तेजी से निकल गया, दूसरे सत्र के शुरू में मेरी दोस्ती हुई सांगा नाम के लड़के से, हम दोनों को अपनी industrial ट्रेनिंग करने के लिए ताज महल होटल में काम मिला था।


सांगा का पूरा नाम राजीव सांगा था और वह अच्छी कद काठी एवं आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था। साथ ही साथ एक प्रफ्फुलित ह्रदय और जिंदगी को हलके फुल्के ढंग से लेने वालो में था। यह एक ऐसा लड़का था जो किसी भी महफिल या जमघट में अपने होने का एहसास आराम से करा लेता था, और सबसे जरूरी बात, कन्याये इनसे बहुत प्रभावित रहती थी और मधुमखी की जैसे शहद के चारो और मंडरायी रहती थी। इनका mission या motto था की जिस लड़की पर उँगली रख दू वो मेरी हो जाती है।

ज्यादा महत्वाकांक्षी नही थे और पढ़ाई भी जितनी मतलब की हो उतनी ही करते थे। एक और महारत  जो इन्हे हासिल थी वो यह की लखनऊ के चप्पे चप्पे का इन्हें ज्ञान था और कहाँ पर सबसे लज़ीज़ कबाब, छोले बठुरे, कचोरियाँ, कुल्फी या बिरयानी मिलती है, पूरी जानकारी yellow pages में with google maps फीड थी.

राका उर्फ़ राकेश तिवारी बहुत ही छरहरी सी कद काठी का स्वामी था पर don गिरी में किस से कम नहीं था। इसके पास एक हरे रंग का प्रिया स्कूटर हुआ करता था। यह आपको हमेशा कॉलेज के गेट के बहार चाय की तपड्डी पर ही बैठा मिला करता था। इनका लाइफ में motto था सब हो जाएगा एवं सब चलता है । महत्वाकांक्षा क्या होती है उस से इनका कोई सारोकार नहीं था। इनका ध्यान सिर्फ़ लड़कियां देखने yani ki laundiyabaaji और उनको छेड़ने में लगा रहता था। हम दोनों एक साथ ही कॉलेज आते थे और चूँकि मेरे पास स्कूटर नहीं था इसलिए मेरा आना जाना इन्ही पर निर्भर करता था। सुबह सुबह यह मुझे लेने आते थे और रोज़ इनका एक ही dialogue होता था चलो पांडू अब अपनी टिका लियो (मतलब पीछे बैठ जाओ)। पढ़ाई से इनका दूर दूर का नाता नहीं था और क्लास्सेस में आना यह अपनी शान के ख़िलाफ़ समझते थे। और अगर गलती से क्लास में आ भी गए थो शिक्षको को परेशान करना इनका पहला उदद्शय होता था।

लूका उर्फ़ रजत सिंह रईस बाप की बिगड़ी औलाद की उपमा पर फिट बैठते थे । अलीगंज के teacher इन्हें स्कूल का नाम रोशन करने का जिम्मेवार बताते थे। मेरे सुनाने में आया था की इन्होने अपने स्कूल में खूब मार कुटाई करी थी और इनको भी एक बार तारो पे लिटा लिटा kar धुना गया था। कॉलेज में लूका allrounder था, भले ही पढ़ाई में पूरी रूचि न हो लेकिंग परीक्षा के दिनों में जाग जाग कर पढ़ाई करता था। क्रिकेट का बेहतरीन खिलाडी और गोविंदा के गानों की धुनों पे डांस करने वाला बेहद ही प्रतिभावान छोरा था। अत्यन्त महत्वाकांक्षी और जुगाड़ वाला था, और surprise surprise........ थुलथुले शरीर का होने और अपनी कुख्यात छवि के बावजूद लड़कियों में पोपुलर था। मुझे आज तक समझ नही आया की लड़कियों को इसमे क्या भाता था।
एक बार मैंने इसकी बहुतो में से एक girlफ्रेंड से पुछा भी........ यह बताओ आखिर तुमने लूका में ऐसा क्या देखा?
वह बोली......... मुझे weird लड़के पसंद है। ( मेरी शंका का समाधान हो गया था)
राका, लूका एवं सांगा (रूप तेरा मस्ताना)

नथू उर्फ़ नवीन नाथ उर्फ़ कायस्थ का बच्चा कभी सच्चा, सच्चा हो तो गधे का बच्चा। इनका शुम्मार भी मेरे करिरबी मित्रो में होता था और जब भी combined study होती थी तो जमावाडा इन्ही के घर पर होता था। वैसे यह funda है बहुत जबरदस्त, सारे साल पडो मत और exam से पहले लड़के एक जगह जमा हो कर अध्यन करते थे। अध्यन तो क्या bc ज्यादा करते थे। नथू शातिर और बहुत ही नाप तौल के कदम रखने वालो में से एक था। to him everything had to be analysed in terms of profit and loss, till date he is the same.


कुक्कू के बारे में तो पहले एक ब्लॉग में विवरण दे चुका हूँ। chracters और भी थे लेकिन लिखने बैठा तो शायाद एक किताब लिख डालू।

अपने बारे में लिखने की तुक बनती नही है, मुझे ऐसा लगता है जिन सब के बारे में मैंने लिखा है यही लोग मेरे बारे में व्याख्यान कर देंगे। आगे इन परिचयों को लेकर कुछ और कहानी और किस्सों का ताना बना बुनने का प्रयास करूंगा।

Monday, May 11, 2009

थप्पड़ की गूँज



In the college days (IHM), as part of our curriculum we were all suppose to undergo summer training. Basically it meant that you can go work in a hotel with little stipend money and hotel will give you to stay for free. It was a win win situation for students. Although the money was never good but it was a good and cheap way to see exotic locations.

This training was available after passing 2nd year of IHM curriculum during summer holidays. Some of the boys went to Manali, few went to Mussorie and the trio of us me, Raka and Sanga  went to the summer capital of pre-independence India the beautiful, beautiful, panoramic, queen of hills NAINITAAL.

 We went to the Arif Castles in Lucknow and negotiated our training details with Mr Dixit, he was some sort of VP in the company.At first he told us no and said that they have stopped hiring summer trainees.Our luck was going strong and Sanga whose father was posted at Nainitaal at that time, pulled few strings and they okayed us for one month of summer training.

Sanga had gone before  myself and Raka. We set off from Lucknow in a UP roadways bus. It was an overnight journey. When we reached, we got warm reception and were told that Sanga's dad is a strict person and we should behave in front of him. I was always scared of Sanga's dad and never came out in front of him for 2 days we stayed at his house

As Arif Castles was situated on the Malli Taal, we were provided with the accommodation next to the hotel only. It was a house just behind the hotel and had 2 rooms in it. There were already 4 boys staying in there before we 3 moved in. The other guys were from Bangalore.

Initially we did not get along well as they were trying to be superiorand throw attitude to us.. After settling down we went to the hotel and we saw that there were 3 more guys working as summer trainees and one was Rohit Shah from our college and he was talking in a very different tone. Rohit used to be one of the most decent guys in our college but here, in the canteen of the hotel, he was showering abuses and swearing left, right and centre.
I went to him and asked him, " what is wrong with you".
  He said,"he is Rahul, twin brother of Rohit." 

As lazy by nature, we were least interested in the training and always thinking of getting off of the work and doing masti. In the house, there was this lad from Jammu and his name was Ankush. He was a big FATTAL and on our first day when we all were trying to break the ice.
  He said," You know there is a bhoot in the house and at night, we always hear the squeaky noise and someone walking outside the windows."
Then only I relaised  that this guy has shot himself in his foot. Knowing Raka and Sanga very well, I kind of guessed that there was something brewing in their destructive minds. A conspiracy was hatched and a plan was made.

First phase was to build up the myth of this bhoot.  We used to have chappal wars before going to sleep amongst Bangalore and Lucknow. But, that night as per the master plan, everyone went to sleep before scheduled time. Basically, all the other boys used to go to sleep anyway, it was us three and Kapil, Ranvir from Bangalore who used to create rucus and fight. Once everybody had gone to sleep, Raka and Sanga got up and covered themselves in a white bed sheet and went outside the window. There they started making funny noises. There was no candle so Raka started to turn off and turn on his lighter. The guy gave no reaction. I was finding it difficult to control my laugh.


Next morning, we were called by the personnel department and I thought that now we are going to get caught. But, the personnel manager told us that they have heard something about this bhoot and all, what do we know about it? We said there is nothing like that. Hence we came to know that the guy almost shitted in his pants and the legend of bhoot was created forever.



Sanga was sort of guy who never took any nonsense from anyone. Once, he was taking this room service tray to Mr Dixit's room and the trainee from Bhubaneshwar, who was working at reception, laughed at him. That infuriated Sanga and he vowed to take revenge against him.

On the same day when we went for lunch, I followed Sanga and that guy was there, Sanga threw a glass of cold water on him and before he could have realised what was going on, he got the thrashing of his life. I was the witness of that event and the matter was brought to the personnel. Although, I did not agree with what Sanga had done  but I didn't divulge any details. Sanga was asked to leave the job with immediate effect. Being part of the trilogy, we also said INQILAAB ZINDABAAD and quit the

training.

We still had another 15 days to go and Sanga did not want her parents to come to know about this fiasco. We kept on staying at the same house. Our routine was to go for the breakfast at one chai shop outside the house, then we will come back and will play cricket in that small corridor all day. Myself and Raka were a team and Sanga was with Ranvir from Bangalore.
Sanga was a sore looser and always won the games by hook or crook (ro ro ke). But soon, hotel came to know about our unofficial stay and we were asked to leave.

Then, the real party started, we had all the time in the world. The weather was fantastic, sun used to shine brightly and the nights were colder but vibrant. Nainital was packed with tourists and there was plenty of eye tonic available on the Maal road.

We came back to the the den (Mr Sanga's house). I kept staying in the room, only came out when Mr Sanga was not around. One day we decided to track to Bhimtal, which was like 25 kms by road but there was a track of 5 km or so. Neeraj chacha, who was a very good friend of mine and lived in Nainital. He also joined us in the pursuit of the tranquility. Four of us, started from Naintal in the morning  towards Bhimtaal. It was  a beautiful day, air was fresh, trees were green and water streams were flowing relentlessly next to the kaccha path.

We reached Bhimtal around midday. It was getting slightly hotter by then. As soon as I saw the lake my heart started to itch for a swim. I proposed it to Sanga and we both decided to take a swim in the lake in our undies only as we were not carrying the costumes ( I do not remember that when I wore a costume while swimming in India).

Bhimtal has an island close to the western bank of the lake and the distance from the bank to the island must be around 25m. We decided to swim to the island. It started as a race but Sanga being a better swimmer overtook me easily. When he reached the island he said," Pandey, we have to swim back as there are lots of plants in here and its difficult to swim."

I panicked as I had already spent most of my energy swimming to the Island.
I said,"I can't swim anymore."
Sanga offered to piggy back on him, when I did that, I caught his undies and he went in the water and drank some.
He panicked as well, he kicked me and left me in the water and swam himself to the safety.

I was totally exhausted and started to imagine about drowning in that lake. But, life is precious. I gathered all my strength and started to swim again. I was exasperating but I had no choice. I swam till I also reached safety. I was completely out of breath, Raka was happy that I had  rescued myself. Because all this time he was thinking of that how he is going to  inform my mother and what trouble he will have to face to get my body recovered from the lake.

All that ends well is good, I survived but learnt a lesson, never tread in unknown waters, no matter how tempting it feels.

to be continued.........




Tuesday, May 5, 2009

भोकाल टाइट है


पहली बार यह वाक्य मैंने तब सुना जब मेरे शुभ चरण लखनऊ में पधारे। बात तब की है जब मैं होटल मैनेजमेंट पढने के लिए लखनऊ में निवास कर रहा था।

कॉलेज से पहले की शिक्षा दीक्षा एक छोटे से शहर उधमपुर में हुई थी और लखनऊ में आना बिल्कुल वैसे ही था जैसे की एक कूप मंडूक का तालाब में पहुँच जाना। परन्तु धीरे धीरे एक जैसी मानसिकता वाले लड़को से मित्रता होती रही और सेहर अपना सा लगने लगा। चूँकि, लखनऊ का अपना एक गौरवमय इतिहास और धरोहर रही है इसलिए संस्कृतक दृष्टिकोण से शहर का अपना ही अंदाज़ है, और यह रोज़मर्रा की बातो और ताकियाकलामो में साफ़ साफ़ दिखाई देता है। राका ने मुझे आज तक तू कह कर नही पुकारा और हमेशा तुम कह कर ही सम्बोधित किया है।

उन्ही शुरआती दिनों में, एक दिन बातो बातो में हमारे एक प्रिय मित्र रौतेला बोले," गुरु, तुम्हारा तो भोकाल टाइट है। "
मैंने कही भाई, इसका मतलब क्या हुआ?
तो जवाब मिला मतलब तो नही मालूम पर एक्स्पलिन जरूर कर सकते हैं।
भोकाल टाइट का मतलब है , " व्यवस्था मज़बूत है "।
मैंने कहाँ- हैं? अब इसका मतलब क्या हुआ? तो जवाब आया," राजनीति का ज्ञान रखते हो"?
मैंने कहा," रोज़ सुबह नवभारत पढता हूँ और पहले पन्ने से लेकर अन्तिम पन्ने तक चाट जाता हूँ."
jतो गोबर गनेश, फॉर example, " आजकल लखनऊ में मुलायम का भोकाल टाइट है" ( उन दिनों मुलायम ही का था, मायावती का बाद में हुआ ).

मेरे मस्तिषक में रौतेला जी के यह बात पत्थर की लकीर की तरह हमेशा हमेशा के लिए अंकित हो गई। कॉलेज के दूसरे साल में मेरी मित्रता हुई, मेरे सबसे परम मित्र राकेश तिवारी उर्फ़ राका से,मरियल सा होता था परन्तु कॉलेज में उसका भोकाल जरूर टाइट था। शायद इसीलिए वह अपने आप को राका कहलवाना पसंद करता था । पर मुझे क्या, मेरे ऊपर तो राका जी की छत्रछाया थी।


राका, सांगा, लूका एवं नाथू कॉलेज की अनधिकृत कार्यकारिणी के अधिकारीयों में से थे, कॉलेज की सारी पार्टियों को कराने का जिम्मा इन्ही का हुआ करता था।पार्टियां कराने का modus operandi बड़ा ही सीधा और सपाट था. आयोजन समिति यह तय कर लेती थी की वैलेंटाइन डे आ रहा है और उस पर पार्टी का आयोजन करवाना अनिवार्य है. अब भैया पार्टी होगी तो पैसे भी खर्च होंगे और उसके लिए सब लोगो से चंदा लेना होगा.

अक्सर चंदा अपनी इच्छा अनुसार दे सकते है पर कार्यकारिणी का भोकाल टाइट था इसलिए चंदा देना अनिवार्य था. चंदा न देने की स्तीथि में आप को टिका कर दिया भी जा सकता था. इस अनिवार्य चंदे को ना देने वाले में चंद लोग ही शामिल थे जैसे की कुक्कू उर्फ़ संदीप कुकरेती, लाला उर्फ़ विवेक श्रीवास्तव एंड बोक्सेर उर्फ़ विपिन कौशल. इसी के चलते कुक्कू जी भी कार्य समिति में शामिल कर लिए गए थे. कार्यसमिति सिर्फ ७५ प्रतिशत ही आयोजन में लगाती थी और बाकि बचा २५ खुद खा जाती थी.

कुक्कू दिखने में हट्टा कट्टा था और लखनऊ उनिवेरसिटी में भी अध्यनरत था. पिछले साल की गर्मियों में मिस्टर नैनीताल भी रह चुका था. कुक्कू और मेरे में कभी भी घनिष्ठता नहीं रही और मुझे वो हमेशा से ही कांचू किस्म का व्यक्ति लगा. एक बार कॉलेज खत्म होने के बाद
कुक्कू बोला - अरे भाई, हम इंदिरा नगर जा रहे अगर तुम चाहो तो तुम्हे ड्राप कर देंगे,
मैंने कहि - नेकी और पूछ पूछ.
जब हम मुंशी पुलिया पहुंचे तो कुक्कू कहिस - का भैया भेजा fry खाओगे?
मैं आश्चर्यचकित हो गया और सोचने लगा कि यह आज उलटी गंगा कैसे बह रही है.
मैंने भेजा fry तो खा लिया पर हजम नहीं हुआ.
घर पहुँच के मैंने सांगा को फ़ोन लगाया और उसे यह सारा वाक़या बयान किया.
सारा कुछ सुनाने के बाद सांगा बोला - पांडे, तू टेंशन ना ले, कुक्कू में कोई बदलाव नहीं आया, यह सब वैलेंटाइन डे पार्टी का कमाल है.